Thursday, April 17, 2025

नीति आयोग (NITI Aayog)

                                                       नीति आयोग (NITI Aayog)           

1.परिचय एवं पृष्ठ्भूमि 

नीति आयोग (NITI Aayog), जिसका पूरा नाम नेशनल इंस्टिट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (National Institution for Transforming India) यानी राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान है, भारत सरकार द्वारा गठित एक प्रमुख नीतिगत 'थिंक टैंक' (Think Tank) है।

● भारत सरकार ने मार्च 1950 में केंद्र सरकार द्वारा तैयार की गई पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से राष्ट्र की आर्थिक रणनीति की देखरेख के लिए योजना आयोग की स्थापना की थी।
➤यह आयोग शुरुआती वर्षों में प्रभावी रहा। यद्यपि, समय के साथ, इस पर बहुत अधिक केंद्रीयकृत होने तथा भारत के राज्यों की विविध आवश्यकताओं और बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा।

● इसलिए केंद्र सरकार ने 13 अगस्त 2014 को तत्कालीन योजना आयोग को समाप्त कर दिया।

● पूर्ववर्ती योजना आयोग के स्थान पर, 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग नामक एक नई संस्था की स्थापना की गई। योजना आयोग के समान, नीति आयोग की स्थापना भारत सरकार के एक कार्यकारी संकल्प द्वारा की गई थी।

● इस प्रकार, नीति आयोग न तो संवैधानिक निकाय है (अर्थात संविधान द्वारा निर्मित नहीं) और न ही सांविधिक निकाय है

                                                                  


2.स्थापना का उद्देश्य

योजना आयोग की स्थापना 1950 में हुई थी और यह मुख्य रूप से पंचवर्षीय योजनाएँ बनाने और राज्यों को वित्तीय संसाधन आवंटित करने का कार्य करता था। समय के साथ, यह महसूस किया गया कि एक केंद्रीकृत योजना प्रणाली बदलते भारत की जटिल आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। राज्यों की भूमिका को अधिक महत्व देने और विकास प्रक्रिया में उन्हें बराबर का भागीदार बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में, सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य है:

● सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर नीतियां बनाएं और उन्हें लागू करें।

● सरकार को नीतिगत और तकनीकी सलाह प्रदान करना।

● विकास के लिए एक दीर्घकालिक, रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना।

3.नीति आयोग के मुख्य उद्देश्य

साझा दृष्टिकोण विकसित करना: राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, क्षेत्रों और रणनीतियों का एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना।
सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना: मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए राज्यों को निरंतर आधार पर संरचित समर्थन पहलों और तंत्रों के माध्यम से सहयोग देना।
ग्राम स्तर पर योजना: ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाएँ बनाने के लिए तंत्र विकसित करना और इन्हें सरकार के उच्च स्तरों तक उत्तरोत्तर एकत्रित करना (बॉटम-अप अप्रोच)।
राष्ट्रीय सुरक्षा: यह सुनिश्चित करना कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को आर्थिक रणनीति और नीति में शामिल किया जाए।
वंचित वर्गों पर ध्यान: समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान देना जिन्हें आर्थिक प्रगति से पर्याप्त रूप से लाभ नहीं मिल पाया है।
रणनीतिक और दीर्घकालिक नीतियां: प्रमुख हितधारकों, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक जैसे शैक्षिक और नीति अनुसंधान संस्थानों के बीच भागीदारी को प्रोत्साहित करना तथा रणनीतिक और दीर्घकालिक नीति व कार्यक्रम के ढांचे तैयार करना।
ज्ञान, नवाचार और उद्यमिता: एक ज्ञान, नवाचार और उद्यमशीलता समर्थन प्रणाली बनाना।
अत्याधुनिक संसाधन केंद्र: सुशासन और सतत व न्यायसंगत विकास में सर्वोत्तम प्रथाओं पर शोध करने वाले एक अत्याधुनिक संसाधन केंद्र के रूप में कार्य करना।
निगरानी और मूल्यांकन: कार्यक्रमों और पहलों के कार्यान्वयन की सक्रिय रूप से निगरानी और मूल्यांकन करना।
क्षमता निर्माण: प्रौद्योगिकी उन्नयन और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना।

4.नीति आयोग के कार्य (Functions):

नीति आयोग मुख्य रूप से चार तरह के कार्य करता है:

● नीति और कार्यक्रम का ढाँचा तैयार करना (Policy and Programme Framework): केंद्र और राज्यों के लिए रणनीतिक और दीर्घकालिक नीतियों और कार्यक्रमों का ढाँचा तैयार करना और आवश्यक सलाह देना।
● सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना (Fostering Cooperative Federalism): राज्यों के साथ मिलकर काम करना, उनकी समस्याओं को समझना और समाधान निकालना। अंतर-राज्यीय और केंद्र-राज्य समन्वय स्थापित करना।
● निगरानी और मूल्यांकन (Monitoring and Evaluation): सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति की निगरानी करना और उनका मूल्यांकन कर सुधार के लिए सुझाव देना।
● ज्ञान और नवाचार हब (Knowledge and Innovation Hub): नवीनतम ज्ञान, अनुसंधान और सर्वोत्तम प्रथाओं को एकत्रित कर सरकार के विभिन्न स्तरों तक पहुँचाना। नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना।

5.नीति आयोग की संरचना (Structure):

अध्यक्ष (Chairperson): भारत के प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष)।
उपाध्यक्ष (Vice-Chairperson): प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त। इन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।
संचालन परिषद / शासी परिषद (Governing Council): इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों (जहाँ विधानसभा है) के मुख्यमंत्री तथा अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होते हैं।
क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils): विशिष्ट क्षेत्रीय मुद्दों को संबोधित करने के लिए आवश्यकतानुसार गठित की जाती हैं। इनमें संबंधित क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होते हैं। इनकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री या उनके द्वारा नामित व्यक्ति करते हैं।
पूर्णकालिक सदस्य (Full-time Members): विषय विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।
अंशकालिक सदस्य (Part-time Members): अग्रणी विश्वविद्यालयों, शोध संगठनों और अन्य प्रासंगिक संस्थानों से अधिकतम दो पदेन सदस्य।
पदेन सदस्य (Ex-officio Members): केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अधिकतम चार सदस्य, जिन्हें प्रधानमंत्री द्वारा नामित किया जाता है।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer - CEO): भारत सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी, जिसे एक निश्चित कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त किया जाता है। वह आयोग के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं।
विशेष आमंत्रित सदस्य (Special Invitees): प्रधानमंत्री द्वारा नामित विशेषज्ञ, विशेष ज्ञान वाले पेशेवर।

6.नीति आयोग का कार्यात्मक ढांचा

नीति आयोग के कार्यात्मक ढांचे को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:

नीति आयोग के दो प्रमुख केंद्र (Two Hubs of NITI Aayog)

नीति आयोग की समस्त गतिविधियों को दो मुख्य केंद्रों में विभाजित किया गया है:

1.टीम इंडिया हब (Team India Hub)
● टीम इंडिया हब सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने तथा नीति एवं कार्यक्रम ढांचे को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
● यह राज्यों के साथ नीति आयोग के सहयोग में आवश्यक समन्वय और सहायता प्रदान करता है।

2.ज्ञान और नवाचार हब (Knowledge and Innovation Hub)
नीति आयोग के ज्ञान और नवाचार हब की प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं:
● अत्याधुनिक संसाधन केंद्र बनाए रखना।
● सुशासन और सर्वोत्तम प्रथाओं पर अनुसंधान के भंडार को बनाए रखना।
● महत्त्वपूर्ण मामलों पर सलाह देना।
● घरेलू और विदेश में कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) सहित प्रमुख हितधारकों के साथ साझेदारी को प्रोत्साहित करना।

7.नीति आयोग के मार्गदर्शक सिद्धांत

अपने विभिन्न कार्यों को करने में, नीति आयोग निम्नलिखित सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है:

अंत्योदय (Antyodaya): पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय‘ के विचार के अनुसार, निर्धनों, हाशिए पर रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सेवा और उत्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
● समावेश (Inclusion): लिंग, क्षेत्र, धर्म, जाति या वर्ग के आधार पर पहचान-आधारित असमानताओं को दूर करते हुए, कमजोर और हाशिए पर रहने वाले वर्गों को सशक्त बनाना चाहिए।
● ग्राम (Village): सभी गांवों को विकास प्रक्रिया में एकीकृत करना, तथा हमारे लोकाचार, संस्कृति और जीविका के आधार की जीवंतता और ऊर्जा को बनाए रखना।
● जनसांख्यिक लाभांश (Demographic Dividend): शिक्षा और कौशल के माध्यम से उनके विकास, और उत्पादक आजीविका के अवसरों के माध्यम से उनके सशक्तिकरण पर फोकस करना, तथा हमारी सबसे बड़ी संपत्ति – भारत के कार्यशील जनसँख्या का उपयोग करना।
● जनभागीदारी (People’s Participation): विकास प्रक्रिया को जन-संचालित प्रक्रिया में परिवर्तित करना तथा सजग और सहभागी नागरिकता को सुशासन का संचालक बनाना।
● सुशासन (Governance): पारदर्शी, जवाबदेह, सक्रिय और सार्थक गवर्नेंस को प्रोत्साहित करना।
● स्थायित्व (Sustainability): पर्यावरण का सम्मान करने वाली हमारी प्राचीन परंपरा को बनाए रखते हुए, अपनी योजना और विकास प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना।

                                                                          


8. नीति आयोग के कार्यक्षेत्र:

नीति आयोग कई क्षेत्रों में काम करता है, जिनमें शामिल हैं:
● कृषि
● उद्योग
● शिक्षा
● स्वास्थ्य
● ऊर्जा
● जल संसाधन
● परिवहन
● ग्रामीण विकास
● शहरी विकास

9. नीति आयोग की पहलें:

नीति आयोग ने कई महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं, जिनमें शामिल हैं:
 अटल इनोवेशन मिशन (Atal Innovation Mission): यह देश में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख पहल है।
 डिजिटल इंडिया (Digital India): यह भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए एक कार्यक्रम है।
● मेक इन इंडिया (Make in India): यह भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए एक पहल है।
 आयुष्मान भारत (Ayushman Bharat): यह भारत में स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने के लिए एक योजना है।
 समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha): यह शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक योजना है।

10.नीति आयोग के सात स्तंभ

नीति आयोग का समग्र कार्यप्रणाली प्रभावी शासन के निम्नलिखित सात स्तंभों पर आधारित है:

1.प्रो-पीपल (Pro-People): नीतियां नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने वाली होनी चाहिए।
2.प्रो-एक्टिव (Pro-Active): सरकार को सक्रिय और समय पर कार्रवाई करनी चाहिए।
3.पार्टिसिपेशन (Participation): नीतियों के निर्माण में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।
4.एम्पॉवरिंग (Empowering): नागरिकों को सशक्त बनाना, खासकर महिलाओं को।
5.इंक्लूजन ऑफ ऑल (Inclusion of All): सभी का समावेश, ताकि कोई भी पीछे न छूटे।
6.इक्वालिटी (Equality): सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
7.ट्रांसपेरेंसी (Transparency): सरकार के कामकाज में पारदर्शिता होनी चाहिए।

                                                         

11 .नीति आयोग और योजना आयोग में मुख्य अंतर:

1. प्रकृति और दृष्टिकोण:

 योजना आयोग (Planning Commission): यह एक शीर्ष-से-नीचे (top-down) दृष्टिकोण वाली संस्था थी। इसका मतलब है कि यह केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं को राज्यों पर थोपती थी। यह केंद्रीकृत योजना पर अधिक केंद्रित थी।
 नीति आयोग (NITI Aayog): यह एक नीचे-से-ऊपर (bottom-up) दृष्टिकोण वाली संस्था है। यह राज्यों की आवश्यकताओं और विचारों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने पर जोर देती है। यह सहकारी संघवाद (cooperative federalism) को बढ़ावा देती है, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं।

2. कार्य क्षेत्र:

● योजना आयोग (Planning Commission): इसका मुख्य कार्य पंचवर्षीय योजनाओं (Five-Year Plans) का निर्माण करना था, जो देश के आर्थिक विकास की दिशा तय करती थीं। यह संसाधनों का आवंटन और विभिन्न क्षेत्रों के लिए लक्ष्य निर्धारित करती थी।
● नीति आयोग (NITI Aayog): यह एक थिंक टैंक (think tank) के रूप में कार्य करता है। इसका कार्य नीतियों का निर्माण, अनुसंधान करना, नवाचार को बढ़ावा देना, और केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देना है। यह पंचवर्षीय योजनाओं की तरह विशिष्ट लक्ष्यों और संसाधनों के आवंटन पर ध्यान केंद्रित नहीं करता है।

3. संरचना:

● योजना आयोग (Planning Commission): इसमें एक उपाध्यक्ष (Deputy Chairman) और कुछ पूर्णकालिक सदस्य होते थे, जिन्हें सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता था।
● नीति आयोग (NITI Aayog): इसमें एक अध्यक्ष (प्रधानमंत्री), एक उपाध्यक्ष, एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य (पदेन), और विशेष आमंत्रित सदस्य होते हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल भी इसकी गवर्निंग काउंसिल का हिस्सा होते हैं।

4. भूमिका:

● योजना आयोग (Planning Commission): यह एक शक्तिशाली संस्था थी, जिसके पास संसाधनों के आवंटन और योजनाओं को लागू करने का अधिकार था।
● नीति आयोग (NITI Aayog): यह एक सलाहकार संस्था है, जिसके पास संसाधनों के आवंटन का अधिकार नहीं है। यह सरकार को नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने में मदद करती है, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार का होता है।

5. उद्देश्य:

● योजना आयोग (Planning Commission): इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना था।
● नीति  आयोग (NITI Aayog): इसका उद्देश्य सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) को प्राप्त करना और सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना है। यह नवाचार, उद्यमिता, और प्रौद्योगिकी के उपयोग पर जोर देती है।

12.महत्व और निष्कर्ष:

नीति आयोग भारत के विकास प्रतिमान में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। यह केंद्रीकृत योजना से हटकर सहकारी संघवाद, नीतिगत सलाह और ज्ञान-आधारित शासन पर जोर देता है। राज्यों को विकास प्रक्रिया में बराबर का भागीदार बनाकर, यह देश की विविधता और जटिलता को बेहतर ढंग से संबोधित करने का प्रयास करता है। यह सरकार के लिए एक दिशात्मक और नीतिगत प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करता है, जिसका लक्ष्य सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना और भारत को एक मजबूत तथा समृद्ध राष्ट्र बनाना है। हालाँकि, इसके पास वित्तीय शक्तियाँ न होने के कारण इसकी प्रभावशीलता काफी हद तक केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग पर निर्भर करती है।

                                                            


Tuesday, April 15, 2025

राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women - NCW)

                            राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women - NCW)       

1.परिचय (Introduction):


राष्ट्रीय महिला आयोग भारत सरकार का एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है। इसका गठन भारतीय संविधान के तहत महिलाओं के हितों की रक्षा करने, उनके कानूनी अधिकारों को सुनिश्चित करने और उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों को रोकने के उद्देश्य से किया गया है। यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्था है।

2.स्थापना (Establishment):

● राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (National Commission for Women Act, 1990) के तहत की गई थी।

● राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन 31 जनवरी 1992 को हुआ है।

● पहली अध्यक्ष श्रीमती जयंती पटनायक थीं।

● वर्तमान अध्यक्ष विजया किशोर रहाटकर (19 अक्टूबर 2024 )

3.उद्देश्य (Objectives):

संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना: महिलाओं के लिए संविधान और अन्य कानूनों के तहत प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों की जांच और समीक्षा करना।

विधायी उपायों की सिफारिश करना: महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन या नए कानूनों को बनाने की सिफारिश करना।

शिकायतों का निवारण: महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन, भेदभाव और अत्याचार से संबंधित शिकायतों को सुनना और उचित कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देशित करना।

नीतिगत मामलों पर सरकार को सलाह देना: महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देना।

महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना: महिलाओं के विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के उपाय सुझाना।

जागरूकता बढ़ाना: महिलाओं को उनके अधिकारों और कानूनों के बारे में जागरूक करना।

4.संरचना (Structure):

एक अध्यक्ष (Chairperson): केंद्र सरकार द्वारा नामित, (जो महिलाओं के हितों के लिए प्रतिबद्ध हो)।

पांच सदस्य (Five Members): केंद्र सरकार द्वारा नामित, (जिन्हें कानून, ट्रेड यूनियनवाद, महिलाओं के उद्योग/प्रबंधन, महिला स्वयंसेवी संगठन, प्रशासन, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा या समाज कल्याण जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल हो।
🠊इन सदस्यों में कम से कम एक अनुसूचित जाति (SC) और एक अनुसूचित जनजाति (ST) से होना अनिवार्य है)।

5.कार्य एवं शक्तियाँ (Functions and Powers):

आयोग के प्रमुख कार्य और शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

● जांच और पड़ताल: महिलाओं के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच और पड़ताल करना।

● रिपोर्ट प्रस्तुत करना: इन सुरक्षा उपायों के कामकाज पर वार्षिक या आवश्यकतानुसार रिपोर्ट केंद्र सरकार को प्रस्तुत करना।

सिफारिशें करना: संघ या किसी राज्य द्वारा महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें करना।

● कानूनों की समीक्षा: समय-समय पर महिलाओं से संबंधित संवैधानिक और अन्य कानूनों के प्रावधानों की समीक्षा करना और उनमें संशोधन की सिफारिश करना।

● अधिकारों के उल्लंघन के मामलों को उठाना: महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों को उपयुक्त प्राधिकारियों के समक्ष उठाना।

शिकायतें देखना: उन शिकायतों को देखना और स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेना जहां: महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ हो,महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का पालन न हुआ हो,महिलाओं की समानता और विकास के उद्देश्य से बनी नीतियों का पालन न हुआ हो।

● अनुसंधान (Research): महिलाओं से संबंधित मुद्दों, विशेष रूप से उनके सामने आने वाली बाधाओं पर अनुसंधान करना।

● नियोजन प्रक्रिया में भागीदारी: महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास की नियोजन प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना।

● विकास का मूल्यांकन: संघ और किसी भी राज्य के तहत महिलाओं के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।

● सिविल कोर्ट की शक्तियाँ: आयोग को किसी भी मामले की जांच करते समय सिविल कोर्ट की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे:
🠊भारत के किसी भी हिस्से से किसी भी व्यक्ति को समन जारी करना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर उसकी जांच करना।
🠊किसी भी दस्तावेज़ को खोजने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता।
🠊शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना।
🠊किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रति की मांग करना।
🠊गवाहों और दस्तावेजों की जांच के लिए कमीशन जारी करना।

6.अन्य महत्वपूर्ण बिंदु -

● राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन - 31 जनवरी 1992 (05 अध्याय व 17 धाराएँ)

● मुख्यालय -नई दिल्ली 

● नोडल मंत्रालय -महिला एवं बाल विकास मंत्रालय 

● UNO द्वारा अंतरष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित -1992 

● कार्यकाल - 3 वर्ष या 65 वर्ष (अध्यक्ष व सदस्य)

● अध्यक्ष एवं सदस्य त्यागपत्र -केंद्र सरकार 

● अध्यक्ष सदस्य का वेतन भत्ता ,पदावधि,सेवासर्ते का निर्धारण -केंद्र सरकार 

● राष्ट्रीय महिला आयोग दिवस - 13 फरवरी 

7.महिला आयोग संबंधित प्रावधान -

● सखी वन स्टॉप सेंटर -2015 
● घरेलू हिंसा अधिनियम -2005 
● अनैतिक व्यापर अधिनियम -1956 
● प्रसव एवं पूर्व निदान तकनीक -1994
● दहेज़ हिंसा अधिनियम -1961  
● भारतीय दंड संहिता 1860 
● राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 
● कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और  निवारण) अधिनियम, 2013 

8.महिला आयोगों के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ: 
 
● पर्याप्त संसाधनों और स्वायत्तता का अभाव: 
🠊महिला आयोगों को प्रायः वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वे सरकारी वित्तपोषण पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं, जो उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है तथा प्रभावी ढंग से कार्य कर सकने की उनकी क्षमता को बाधित कर सकता है।  
● राजनीतिक हस्तक्षेप: 
🠊सत्तारूढ़ सरकार द्वारा मनोनीत होने के कारण महिला आयोगों को उन मामलों से बचने के लिये दबाव का सामना करना पड़ सकता है जो संभावित रूप से सरकार या उसके सहयोगियों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। 
🠊यह राजनीतिक हस्तक्षेप महिलाओं के अधिकारों के प्रति आयोग की निष्पक्षता एवं प्रतिबद्धता को कमज़ोर कर सकता है। 
● सीमित जागरूकता और पहुँच: 
🠊महिलाओं की एक बड़ी संख्या (विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में) महिला आयोगों के अस्तित्व और भूमिका से प्रायः अवगत नहीं है। 
🠊जागरूकता की कमी, चुनौतियों का सामना करने पर इन आयोगों से सहायता और समर्थन ले सकने की उनकी क्षमता को बाधित करती है। 

9.निष्कर्ष (Conclusion):

राष्ट्रीय महिला आयोग भारत में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनके सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था है। यह महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्याय के विरुद्ध एक आवाज के रूप में कार्य करता है और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएं हैं, फिर भी यह देश में लैंगिक समानता और न्याय को बढ़ावा देने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।




                                                                     

Friday, April 4, 2025

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक

                                          भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक            




भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है, जो देश की वित्तीय व्यवस्था के प्रहरी के रूप में कार्य करता है। 

● महालेखाकार का कार्यालय वर्ष 1858 में स्थापित किया गया था, ठीक उसी वर्ष जब अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में लिया था।

● वर्ष 1860 में सर एडवर्ड ड्रमंड को पहले ऑडिटर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया। इसके कुछ समय बाद भारत के महालेखापरीक्षक को भारत सरकार का लेखा परीक्षक और महालेखाकार कहा जाने लगा।

● वर्ष 1866 में इस पद का नाम बदलकर नियंत्रक महालेखा परीक्षक कर दिया गया और वर्ष 1884 में इसे भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के रूप में फिर से नामित किया गया।

● भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत महालेखापरीक्षक को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया क्योंकि इस पद को वैधानिक दर्जा दिया गया था।

● भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने संघीय ढाँचे में प्रांतीय लेखा परीक्षकों के लिये प्रावधान करके महालेखापरीक्षक के पद को और शक्ति दी।

● वर्ष 1936 के लेखा और लेखा परीक्षा आदेश ने महालेखापरीक्षक के उत्तरदायित्वों और लेखा परीक्षा कार्यों का प्रावधान किया।

● यह व्यवस्था वर्ष 1947 तक अपरिवर्तित रही। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक नियंत्रक और महालेखापरीक्षक नियुक्त किये जाने का प्रावधान किया गया।

● वर्ष 1958 में CAG के क्षेत्राधिकार में जम्मू और कश्मीर को शामिल किया गया।

● अधिनियम ने CAG को केंद्र और राज्य सरकारों के लिये लेखांकन और लेखा परीक्षा दोनों की ज़िम्मेदारी दी।

● वर्ष 1976 में CAG को लेखांकन के कार्यों से मुक्त कर दिया गया।

1. संवैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद 148:  भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति, कार्यकाल और शक्तियों का प्रावधान करता है।

 अनुच्छेद 149: CAG के कर्तव्यों और शक्तियों को परिभाषित करता है।

● अनुच्छेद 150: संघ और राज्यों के खातों के प्रारूप के बारे में बताता है, जो राष्ट्रपति द्वारा CAG की सलाह पर निर्धारित किया जाता है।

अनुच्छेद 151: CAG की रिपोर्टों को राष्ट्रपति और राज्यपालों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रावधान करता है, जिन्हें बाद में संसद और राज्य विधानमंडलों में रखा जाता है।

अनुच्छेद 279 : इसमें प्रावधान है कि CAG "शुद्ध आगम" की गणना को प्रमाणित करता है और उसका प्रमाणपत्र अंतिम होता है।

● तीसरी अनुसूची : धारा IV में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और CAG द्वारा पद ग्रहण करने पर ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान का प्रावधान है।

2. नियुक्ति, कार्यकाल और पदमुक्ति:

● CAG की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा उनके हस्ताक्षर और मुहर के तहत एक वारंट द्वारा की जाती है।

● CAG, अपना पद संभालने से पूर्व, राष्ट्रपति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान करता है और उस पर हस्ताक्षर करता है:

● भारत के संविधान के प्रति सच्ची आस्था और राजनिष्ठा बनाए रखना।

● भारत की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखना।

● बिना किसी भय या पक्षपात, स्नेह या द्वेष के अपने कार्यालय के कर्त्तव्यों का विधिवत् और निष्ठापूर्वक तथा अपनी सर्वोत्तम क्षमता, ज्ञान एवं निर्णय लेने की कुशलता के अनुसार पालन करना।

● संविधान और कानूनों को कायम रखना।

● वह छह वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रहता है।

● वह राष्ट्रपति को त्यागपत्र संबोधित करके किसी भी समय अपने पद को त्याग सकता है। उसे राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान आधारों पर और उसी तरीके से हटाया भी जा सकता है।

3. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु 

● भारत के CAG के बारे में: संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार, भारत का CAG भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग का प्रमुख होता है। वह सार्वजनिक निधि की सुरक्षा और केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर वित्तीय प्रणाली की देखरेख के लिये ज़िम्मेदार होता है। 

● भारत का CAG नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 द्वारा शासित होता है,(वर्ष 1976, 1984 और 1987 में महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गए)

4.संपरीक्षा प्रतिवेदन:

● अनुच्छेद 151 संपरीक्षा प्रतिवेदन से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि -
(1) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के संघ के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।
(2) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उस राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगा।

5. कर्तव्य और शक्तियाँ:

● लेखा परीक्षा: CAG केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, और उन सभी संस्थाओं की लेखा परीक्षा करता है जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्त पोषित किया जाता है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) और सरकारी विभाग शामिल हैं।

● अनुपालन लेखा परीक्षा: यह जांचना कि व्यय विधियों और नियमों के अनुसार है या नहीं।

● प्रदर्शन लेखा परीक्षा: यह जांचना कि सरकारी कार्यक्रम और परियोजनाएँ कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से लागू किए जा रहे हैं या नहीं।

● वित्तीय लेखा परीक्षा: यह सुनिश्चित करना कि वित्तीय विवरण सही और निष्पक्ष रूप से वित्तीय स्थिति को दर्शाते हैं।

● रिपोर्ट प्रस्तुत करना: CAG अपनी लेखा परीक्षा रिपोर्ट राष्ट्रपति (केंद्र के लिए) और राज्यपालों (राज्यों के लिए) को प्रस्तुत करता है।

● संसद/विधानमंडल की सहायता: CAG लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC) और सार्वजनिक उपक्रमों पर समिति (Committee on Public Undertakings - COPU) जैसी संसदीय समितियों को उनके कार्यों में सहायता करता है।

6. महत्व और भूमिका:

● वित्तीय जवाबदेही: CAG सरकारी खर्चों की निगरानी करके और अनियमितताओं को उजागर करके वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करता है।

● पारदर्शिता: CAG की रिपोर्टें सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध होती हैं, जिससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ती है।

● संसद और विधानमंडलों को जानकारी: CAG संसद और राज्य विधानमंडलों को सरकारी वित्त और खर्चों पर स्वतंत्र और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है।

● सुशासन: CAG भ्रष्टाचार को रोकने और सुशासन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

● लोक धन का संरक्षक: CAG लोक धन का कुशल और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करता है।

7. CAG की स्वतंत्रता:

● CAG की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में कई प्रावधान किए गए हैं:

● सुरक्षित कार्यकाल: CAG को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है।

● संचित निधि से वेतन: CAG का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होते हैं, जिस पर संसद में मतदान नहीं होता है।

● पदमुक्ति के बाद प्रतिबंध: CAG को पदमुक्ति के बाद सरकार के अधीन किसी भी पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

● कर्मचारियों की नियुक्ति: CAG अपने कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को निर्धारित करने में स्वतंत्र है।

CAG संबंधित प्रश्न:

प्रश्न-1. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के संवैधानिक प्रावधानों का वर्णन कीजिए।

प्रश्न-2. CAG की भूमिका और महत्व पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न-3. CAG की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं?

प्रश्न-4. CAG की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए सुझाव दीजिए ?


                                                             


Wednesday, April 2, 2025

खजुराहो मंदिर

                             

खजुराहो मंदिर

 खजुराहो मंदिर, मध्य प्रदेश राज्य के छतरपुर जिला,सागर संभाग (बुन्देखण्ड पठार)में स्थित, भारतीय कला और संस्कृति का एक अद्भुत उदाहरण है। ये मंदिर अपने जटिल नक्काशीदार मूर्तियों और कामुक कला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

इतिहास:

● खजुराहो हिंदू(शैव और वैष्णव) व जैन मंदिरों का समूह है, जो मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में विंध्य पर्वत शृंखला पर अवस्थित हैं। इतिहास मे इन मंदिरों का सर्वप्रथम लिखित उल्लेख अबू-रिहान-अल-बरूनी तथा अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता के विवरणों में मिलता है।

● इन मंदिरों का निर्माण 950-1050 ईस्वी के मध्य चंदेल शासकों ने कराया था। गुप्तकाल के दौरान तराशे हुए पाषाण खंडों से मंदिर निर्माण की जो कला आरंभ हुई थी, वह चंदेलों के शासनकाल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। इस दौरान मंदिरों के निर्माण के लिये चिनाई पद्धति का प्रयोग किया जाने लगा था।

● खजुराहो के मंदिर वास्तुकला के ‘नागर शैली’ का अद्भुत उदाहरण हैं। गर्भगृह, शिखर (वक्रीय बुर्ज) और मंडप (प्रवेश द्वार) नागर शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। सामान्य रूप से यहां के मंदिर बलुआ पत्थर से निर्मित किय गए हैं, लेकिन चौंसठ योगिनी, ब्रम्हा तथा लालगुआ महादेव मंदिर ग्रेनाइट से निर्मित है 

● खजुराहो के मंदिरों की वास्तुकला अत्यंत जटिल है। एक गर्भगृह, महामंडप, सभागृह, अर्धमंडप (अतिरिक्त सभागृह) तथा प्रदक्षिणा पथ इसके प्रमुख घटक हैं। यहाँ कुछ मंदिर पंचायतन शैली में भी बने हैं। ध्यातव्य है कि पंचायतन शैली के अंतर्गत एक केंद्रीय मंदिर के चारों कोनों पर चार अतिरिक्त मंदिर बने होते हैं।

● ऐतिहासिक अभिलेखों में दावा किया गया हैं कि 12 वीं सदी के दौरान लगभग 20 कि.मी. में फैले इन मंदिरों की संख्या 85 थी। इनमें से अधिकांश मंदिर नष्ट हो गए हैं तथा वर्तमान में इनकी संख्या लगभग 20-25 है।

● खजुराहो के मंदिर पश्चिमी, पूर्वी तथा दक्षिणी समूह में विभाजित हैं। इनमें पश्चिमी समूह के मंदिर शैव एवं वैष्णव संप्रदाय से संबंधित हैं। इन मंदिरों में चौंसठ योगिनी मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, देवी जगदंबा मंदिर, नंदी मंदिर, लक्ष्मण मंदिर (विष्णु् मंदिर), वराह मंदिर आदि प्रमुख हैं।

● पूर्वी समूह के मंदिर हिंदू व जैन संप्रदायों से संबंधित हैं। इसमें ब्रह्मा, वामन, आदिनाथ, पार्श्वनाथ तथा घंटाई मंदिर प्रमुख है। इसके अलावा, दुलादेव (शैव संप्रदाय) तथा जटकारी (वैष्णव संप्रदाय) मंदिर दक्षिणी समूह से संबंधित हैं।

खजुराहो से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण जानकारी :-

● खोज -1838 में टी.एस.बर्ट

● संस्थापक- चन्द्रवर्मन

● यूनेस्को द्वारा वर्ष 1986 में ‘विश्व धरोहर स्थल’ का दर्जा प्रदान किया गया था। (कंदरिया महादेव मंदिर के कारण) 

● प्रसिद्ध का कारण -कामुक्ता शैली या कामवासना शैली ,मप्र का प्रथम शिल्पग्राम ,मप्र का प्रथम हीरा संग्रहालय ,प्रथम यूनिस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल (1986),आदिवासी कला संग्रहालय ,एशिया का सबसे बड़ा पनीर संयंत्र ,

● आक्रमण -खजुराहो पर प्रथम मध्यकालीन आक्रमण गजनवी वंश के शासक मोहम्मद गजनवी के द्वारा किया गया था इस समय चंदेल वंश का शासक विद्याधर था ,जो युध्य में पराजित हो जाता है परन्तु गजनवी जीते हुए किले को वापस लौटा देता है और विद्याधर को महँ शासक के रूप में उल्लेखित करता है 

● निमाड़ का खजुराहो ऊन (खरगोन) को कहा जाता ,छोटा खजुराहो सोमेश्वर महादेव मंदिरको कहा जाता है,

● खजुराहो का उल्लेख -इब्नबतूता(मोहम्मद बिन तुकलाक) ,अलबरूनी (गजनवी),हेनसांग(हर्षवर्धन)

● अलबरूनी ने खजुराहो को जेजाकभुक्ति ,इब्नबतूता ने काजरा ,हेनसांग ने ती -ति -ची कहा है

● खजुराहो नृत्य समारोह -1975 (मप्र पर्यटन अकादमी ,मप्र संस्कृत अकादमी ,उस्ताद अलाउद्दीन खा अकादमी इन तीनो के संगठन से प्रयास से खजुराहो में खजुराहो नृत्य समारोह का आयोजन किया जाता है)

● खजुराहो में छत्रसाल हवाई अड्डा ,वायुयान अकादमी (2021) ,यहाँ पर पर्यटन ट्रैन रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स चलाई गयी है 

● खजुराहो मंदिरो का निर्माता -राजा धंग को कहा जाता हैं 

                                                                             



खजुराहो के महत्वपूर्ण मंदिर 

● पश्चिमी समूह: यह समूह सबसे महत्वपूर्ण है और इसमें कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और विश्वनाथ मंदिर जैसे प्रमुख मंदिर शामिल हैं।

● पूर्वी समूह: इस समूह में जैन मंदिर और कुछ हिंदू मंदिर शामिल हैं।

● दक्षिणी समूह: इस समूह में दूल्हादेव मंदिर और चतुर्भुज मंदिर जैसे मंदिर शामिल हैं।

प्रमुख मंदिर:

● कंदरिया महादेव मंदिर: यह खजुराहो का सबसे बड़ा और सबसे अलंकृत मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है और अपनी उत्कृष्ट नक्काशी और जटिल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है।

● लक्ष्मण मंदिर: यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और अपनी त्रिमुखी विष्णु प्रतिमा के लिए जाना जाता है। मंदिर की दीवारों पर विभिन्न देवताओं, अप्सराओं और दैनिक जीवन के दृश्यों को दर्शाया गया है।

● विश्वनाथ मंदिर: यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और अपनी विशाल शिवलिंग और सुंदर नंदी प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है।

● चौंसठ योगिनी मंदिर: यह खजुराहो का सबसे पुराना मंदिर है और यह 64 योगिनियों को समर्पित है। यह एक आयताकार मंदिर है और इसमें कोई शिखर नहीं है।

● पार्वती मंदिर: यह मंदिर भगवान शिव की पत्नी पार्वती को समर्पित है और अपनी सुंदर प्रतिमा के लिए जाना जाता है।


                                                            


नीति आयोग (NITI Aayog)

                                                        नीति आयोग (NITI Aayog)             1.परिचय एवं पृष्ठ्भूमि  नीति आयोग (NITI Aayog), ...